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लोगों के बीच रहने वाले नेताजी अचानक गुम हो गए हैं। क्षेत्र में लोकप्रिय होने के साथ-साथ प्रदेश में भी उनकी पहचान है। चुनावी वर्ष है, लेकिन कोरोना का डर से अंडरग्राउंड हो गए हैं। दो दिन पहले एक समर्थक ने नेताजी को फोन किया। कहा एक कार्यक्रम रखे हैं। आपको आना होगा। नेताजी ने कहा, बाहर हैं। आ नहीं सकते। कुछ दिन रूक जाईए। उसके बाद ही आ सकते हैं। फोन कटने के बाद नेताजी कह रहे थे। अभी जान पर आफत है और इन्हें कार्यक्रम की सूझ रही है। जान बचेगी तो न नेतागिरी। इधर नेताजी के चाहने वाले बैचेन हैं। क्षेत्र के लोग नेताजी के बारे में पूछते हैं तो समर्थक कहते हैं, वे अभी बाहर हैं। जल्द ही आएंगे। तब लोग मुंह पर बोल देते हैं, हम जानते हैं वे कोरोना के डर से गुम हैं! जो हो, जान बचेगी तो रस्सी बांटकर भी खा लेंगे।