उ से लड़के क नम

लॉकडाउन का एक माह यानी संस्कृति, संस्कार और सेहत को सहेजने का मौका। कोरोना के संक्रमण को रोकने का यह प्रमुख अस्त्र ही न होकर सामाजिक बदलाव की धुरी भी साबित हो रहा है। शारीरिक दूरी का मंत्र सामाजिक रिश्तों को जोड़ने की मजबूत डोर है। संवेदनशीलता, सजगता और सतर्कता का पाठ पढ़ाने के साथ ही यह संवादहीनता को भी दूर करने का सशक्त माध्यम बनकर सामने आया है। रामायण, महाभारत जैसे धारावाहिकों को एक साथ तीन-तीन पीढि़यां न सिर्फ देख रही हैं बल्कि संस्कार और अपनी संस्कृति को समृद्ध बनाए रखने का संकल्प भी ले रहे हैं। लॉकडाउन के दौरान कामकाज की दौड़भाग से दूर बच्चों को बाबा का दुलार मिल रहा है तो परिवार के सदस्य एक-दूसरे से अपना सुख-दुख भी साझा कर अपने मन को हल्का कर रहे हैं। इसके अलावा योग, साधना और सात्विक आहार के प्रति आकर्षण बढ़ा है। सुबह-शाम गूंजती घंटियों की आवाज आस्था और एकाग्रता का परिचय करा रही हैं। लॉकडाउन के एक माह पूरे होने पर प्रस्तुत है रिपोर्ट.. संस्कार और परंपराओं को मिली मजबूती