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याचिका में कहा गया है कि विधायिका को कार्यपालिका और न्यायपालिका के सदस्यों से बेहतर वेतन भत्ते और सेवानिवृत लाभ मिलते हैं। विधायिका से अपेक्षा होती है कि वे अपने निजी हितों से ऊपर उठकर जनता और अपने निवार्चन क्षेत्र के लोगों की पूर्णकालिक सेवा करेंगे। मांग है कि कानून के पेशे की उत्कृष्टता बनाए रखने के लिए एडवोकेट एक्ट और बीसीआई के नियमों को पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए। बहुत से विधायक और सांसदों (कानून निर्माता) के पास कारपोरेट रिटेनरशिप है और वे कानून का उल्लंघन करने वाले अपने मुवक्किलों का अदालत में बचाव करते हैं। ये एक तरह से हितों का टकराव है। ये सिर्फ अनुचित और अनैतिक ही नहीं है बल्कि बीसीआई के नियम 49 का उल्लंघन भी है। पत्र मे लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की अहम भूमिका का भी विस्तृत जिक्र किया गया है।