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प्रधान पद के इस आकर्षण का सीधा प्रभाव अब गावं के सद्भाव पर देखने को मिल रहा है। जिले में अधिकांश गांव कम जनसंख्या वाले हैं। पलायन के चलते मतदाताओं की संख्या कम हो चुकी है। ऐसे छोटे गांवों में अब राठवाद पनपने लगा है। बड़ी राठ वाले अपने को बीस मान रहे हैं। वहीं कल तक के दोस्त अब प्रधान के चुनाव में आमने सामने खड़े हैं। ज्यों ज्यों चुनाव की तिथि निकट आएगी यह वैमनस्य आगे बढ़ता जाएगा। जिला मुख्यालय से सटे ग्राम पंचायतों में तो प्रधान पद के लिए गांव से प्रत्याशियों की संख्या बढ़ते ही मीटिंग हो रही हैं। बैठकों में तक एक राय नहीं बन पा रही है। दूसरी तरफ क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के लिए इतना आकर्षण नजर नहीं आ रहा है।