जैसलमेर ट्रैक्टर

मैंने कहा, ‘इतना निराश होने की भी जरूरत नहीं है। शर्म, लाज, हया तो मनुष्य के आभूषण हुआ करते हैं। सोचो भला, जब तुम ही न रहोगी, तो मानवता दरिद्रता के फूलों की माला पहने हुए कितनी विद्रूप दिखाई पड़ेगी?’ शर्म खिसियानी हंसी हंसते हुई बोली, ‘यही बात तुम राजनीति, मजहब और उद्योग-व्यापार में लिप्त उन लोगों को जाकर क्यों नहीं समझाते हो, जिन्होंने अपनी शर्म बेच खाई है। आज सभी क्षेत्र धंधे में बदल चुके हैं। पैसा ही भगवान हो गया है। इससे पहले कि मैं जितनी भी बची हुई हूं, लोग उसे भी बेच दें, मेरा मर जाना ही बेहतर होगा।’