बजरंगबल के भक्त है सलमन डयलग

रद हुए तीनों कृषि कानूनों की विशेषताओं और लोकतांत्रिक ढांचे में निर्णय प्रक्रिया से जुड़े जटिल विमर्श के बीच ऐसा प्रतीत होता है कि हम वस्तुस्थिति पर व्यापक दृष्टि नहीं डाल पा रहे। ऐसे में कुछ आधारभूत प्रश्न विचारणीय हैं। भारत जैसे प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र में जनता प्रत्यक्ष रूप से नीति-निर्धारण नहीं करती, अपितु अपने प्रतिनिधि चुनती है, जो वांछित नीतियों को आकार देते हैं। इस पूरे प्रकरण में यह भावना क्षीण होती नजर आई। नि:संदेह नागरिकों की सहभागिता मात्र मतदान तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए। गतिशील एवं सक्रिय समुदाय चुनावों की अवधि के बीच निष्क्रिय नहीं रह सकते। यूं तो असहमति का अधिकार किसी भी लोकतंत्र में एक अभिन्न एवं अंतर्निहित पहलू है, परंतु विरोध-प्रदर्शन के रूप-स्वरूप और प्रकृति पर भी विचार किया जाना चाहिए? हम सभी साक्षी हैं कि कृषि कानून विरोधी धरना-प्रदर्शनों में किस प्रकार सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाई गई।