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भारतीय त्योहारों पर बाजारीकरण का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। होली पर जो चीजें महिलाएं अपने घरों पर हाथ से ही बनाना पसंद करती थीं, वे अब बाजार में दुकानों की शोभा बढ़ाने के साथ ही ग्राहकों को आकर्षित करती हैं। एक तो बाजार में बिकने वाले आलू के चिप्स, कचरी और पापड़ महंगे हैं और दूसरे शुद्धता का भी अभाव है। स्वाद और प्रेम तो गायब ही हो चुका है। कई दुकानों पर आलू के साथ ही चावल से बने रंगीन कचरी, पापड़ बिक रहे हैं। इनमें तरह तरह के रंग इसलिए मिला दिए जाते हैं, जिससे देखने में आकर्षक लगें। भले ही ये रंग सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं। बाजार में इन दिनों इस तरह की सामग्री की भरमार है। पहले होली से हफ्तों पूर्व घर घर में आलू के चिप्स, पापड़, कचरी आदि बनाने का कार्य शुरू हो जाता था। घरों पर तैयार होने वाली इन चीजों में शुद्धता के साथ ही प्रेम का स्वाद भी होता था लेकिन बाजारीकरण से ये स्वाद गायब हो गया है। तमाम परिवार घरों पर इन चीजों को तैयार करने के बजाय बाजार से खरीद रहे हैं। दरअसल लोगों के पास अब समय का अभाव है। इसी वजह से आलू के चिप्स, कचरी और पापड़ बाजार से खरीदना लोगों को ज्यादा सुविधाजनक लगता है। हालांकि घर पर ही इन्हें बनाना अच्छा है। क्योंकि एक तो खर्च कम और पूरी शुद्धता रहती है।