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पशुओं को भी बीमारी व जान का खतरा : ठंड के मौसम में पशुओं की वैसे ही देखभाल करें जैसे हम लोग अपनी करते हैं। उनके खाने-पीने से लेकर उनके रहने के लिए अच्छा प्रबंध करे ताकि वो बीमार न पड़े और उनके दूध उत्पादन पर प्रभाव न पड़े। खासकर नवजात तथा छह माह तक के बच्चों का विशेष देखभाल करें। प्रखंड भ्रमणशील चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. निशांत कुमार बताते है कि अभी पशुओं में डायरिया, सर्दी, खांसी, नाक से अधिक पानी निकलना और बैठने के बाद उठने में समस्या की शिकायत आ जाती है। कहा कि वैसे खुरहा रोग का टीकाकरण किया गया है। लेकिन समस्या आती है तो पशु अस्पताल से संपर्क की सलाह दिया। ठंढ में पशुओं को खुली जगह में न रखें, ढंके स्थानों में रखे। रोशनदान, दरवाजों व खिड़कियों को टाट और बोरे से ढंक दें। पशुशाला में गोबर और मूत्र निकास की उचित व्यवस्था करें ताकि जल जमाव न हो पाए। पशुशाला को नमी और सीलन से बचाएं । ऐसी व्यवस्था करें कि सूर्य की रोशनी पशुशाला में देर तक रहे। बासी पानी पशुओं को न पिलाए। बिछावन में पुआल का प्रयोग करें। प्रसव के बाद मां को ठंडा पानी न पिलाकर गुनगुना पानी पिलाएं। गर्भित पशु का विशेष ध्यान रखें व प्रसव में जच्चा-बच्चा को ढके हुए स्थान में बिछावन पर रखकर ठंड से बचाव करें।बिछावन समय-समय पर बदलते रहे। अलाव जलाएं पर पशु की पहुंच से दूर रखें। इसके लिए पशु के गले की रस्सी छोटी बांधे ताकि पशु अलाव तक न पहुंच सके। ठंड से प्रभावित पशु के शरीर में कंपकंपी, बुखार के लक्षण होते हैं तो तत्काल निकटवर्ती पशु चिकित्सक को दिखाएं। उन्होंने गर्भवती व अन्य पशु को भी भरपूर ताजा खाना, पानी पिलाने मिनरल पाउडर का प्रयोग की सलाह दी।