आईपएस अधकर रैंक

आचार्य प्रवर दिव्यानन्द सूरीश्वर जी (निराले बाबा) के सानिध्य में स्थानीय निराला भवन में चल रहे समन्वय चातुर्मास 2017 के तहत आयोजित समागम में प्रवचन करते हुए निराले बाबा ने कहा कि संतों के समागम, वाणी व विचारों से उत्तम कोई चीज नहीं है। मानव का महत्व तो अदृश्य को साक्षात करने में है, आत्मा रूपी तत्व का बोध पाने में है। आत्मा को महानात्मा बनाकर उसे परमात्मा बनाने में है। देवता चाहकर भी यह कार्य नहीं कर सकते, पर मानव यह कार्य कर सकता है पर तभी जब वह अंतर के कलुष को हवा दे। क्रोधादि का उपशमन कर दे। धर्म इसी का नाम हैं। आचार्य प्रवर ने कहा कि जीवन जीने के दो पथ हैं। एक संसार का पथ और दूसरा मुक्ति का पथ हैं। संसार का पथ आत्मा को कलुषित बनाता है, जन्म जन्मांतर तक उसे चतुष्गति रूप भव-भ्रमण कराता है, सुख-दु:ख का नियामक बन उसे हंसाता और रूलाता है। मुक्ति का पथ आत्मा शुद्धि का पथ है। उन्होंने कहा कि कलुषित आत्मा के कलुष के शमन के लिए सग्यक्तप की अराधना, नया कलुष आत्मा को काली न करे अत: संयम साधना, चरित्र साधना और परिणामस्वरूप आत्मा को स्व स्वरूप में प्रकट कर सिद्धशिला रूप में स्थित करना ही धर्म का मुक्ति पथ हैं। उन्होंने कहा कि जीवन में धर्म को सही अर्थ में स्थान देना है तो सर्वप्रथम अंतरात्मा की ओर मुड़ने के लिए क्रोध को त्यागना होगा व लोभ की भावना को मिटाना होगा। मानव मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, स्थानक आदि धर्म स्थानों में जाकर पूजा पाठ करता हैं, धर्म क्रियाएं करता है लेकिन उनके स्वयं के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आता, उनका व्यवहार वैसा ही बना रहता है। उन्होंने कहा कि आज के युवा वर्ग पर बुजुर्ग लोगों के धर्म ध्यान का प्रभाव क्यों नहीं पड़ता। क्योंकि युवा समाज धर्म से विमुख बनता जा रहा हैं इसका कारण यही है कि पहली पीढ़ी जो कुछ धर्म के नाम पर करती है, उस धर्म का अंश मात्र भी उनके जीवन व्यवहार में देखने को नहीं मिलता। वे धर्म करते हैं अपने को धर्मात्मा कहलाने के लिए, लोगों की नजरों में अपने आपको धर्मात्मा ठहराने के लिए। उनका धर्म बाहर ही बाहर दिखाई देता है पर अंदर में धर्म के नाम पर एक बहुत बड़ी शून्यता व्याप्त है।